वो हमारे लिए नहीं नाचते।
उनके दाहिने हाथ का डमरू
एक संसार को जगाता है:
एक अक्षर, फिर काल।
उनके बाएँ हाथ की अग्नि
उसे फिर वापस ले लेगी।
दोनों के बीच, एक क़दम।
वही क़दम सब कुछ है।
उनकी एड़ी के नीचे, विस्मृति,
वह छोटा-सा 'मैं' जो मानता है
कि गाना बस उसी का है।
वो दूसरा पाँव उठाते हैं: शरण।
और पास से देखिए। आग का वो घेरा
बस ठंडा होता पदार्थ है,
वही आग जिसने लोहा गढ़ा
तारे में, कील में, आपके रक्त में।
सृष्टि, विनाश की दुश्मन नहीं है।
वो एक ही मुद्रा हैं, इतनी देर थमी हुई
कि हमने ठहराव को हमेशा का समझ लिया,
और उस ठहराव को नाम देकर संसार कह दिया।
जब अंतिम डमरू शांत हो जाएगा
और अग्नि अपना हिस्सा पा लेगी,
वो नाचना बंद नहीं करेंगे।
वो बस गिनती फिर से शुरू करेंगे।
लोहे से भारी हर परमाणु किसी मरते तारे में ढला था। आप, सचमुच, किसी पुरानी अग्नि की राख हैं, जो अब भी नाच रही है।