पूरा, अब भी अंधेरे में
एक अंधेरा कमरा। छह जानकार, आँखों पे पट्टी। उनके बीच में, कुछ बहुत बड़ा और साँस लेता हुआ।
सुनाने वाला
“सबसे एक ही सवाल पूछा गया। तुम्हारे सामने ये क्या है?”
एक हाथ को मिलता है: साँप
सूँड़ के चारों तरफ़ कसते हाथ
पहला
“साँप है। मेरी बाँह जितना मोटा, और हिलता भी है। मुझे पूरा यक़ीन है। ये साँप है।”
एक हाथ को मिलता है: पंखा
कान पे टिकी हथेली
दूसरा
“बेवक़ूफ़ हो तुम। ये पंखा है, चौड़ा और पतला। हिलाओ तो हवा करता है।”
एक हाथ को मिलता है: भाला
दाँत को पकड़े हुए
तीसरा
“दोनों नहीं। ये चिकना है, सख़्त है, और नोक पे जाकर ख़त्म होता है। भाला है। हमें डरना चाहिए।”
एक हाथ को मिलता है: खंभा
एक पाँव के चारों तरफ़ बाँहें
चौथा
“बकवास। ये खंभा है। पेड़ है। पूरी दुनिया की छत इसी पे टिकी है।”
एक हाथ को मिलता है: दीवार
बग़ल से टिका हुआ
पाँचवाँ
“दीवार है। गर्म, बेअंत। मुझे तो इसका कोई सिरा ही नहीं मिलता।”
एक हाथ को मिलता है: रस्सी
उँगलियों में एक पतली डोर
छठा
“रस्सी है, सिरे पे उधड़ी हुई। तुम सब सपना देख रहे हो।”
पूरा, अब भी अंधेरे में
वो सुबह तक बहस करते रहे। एक ने भी झूठ नहीं बोला।
सुनाने वाला
“हर एक के पास एक झूठे पूरे की सच्ची ख़बर थी। छह सच्ची बातें, और हाथी एक भी नहीं।”
पूरा, अब भी अंधेरे में
सदियों बाद, यंत्रों से भरे एक कमरे में
बाद का एक स्वर
“हमने रोशनी से वही सवाल पूछा। ये लहर है या कण? उसने कहा हाँ, और हाँ, और चुनने से मना कर दिया।”
पूरा, अब भी अंधेरे में
बाद का एक स्वर
“पुराने जैनों के पास हमारी इस विनम्रता के लिए एक लफ़्ज़ था। स्याद्वाद। हो सकता है। हर ईमानदार जवाब वहीं से शुरू होता है।”
एक झूठे पूरे की छह सच्ची ख़बरें। हाथी कभी ग़लत नहीं था। ग़लत सिर्फ़ हमारा यक़ीन था।